नए प्रकार का भ्रष्टाचार
पैराडाइज पेपर्स लीक मामले ने एक बार फिर देश में नए प्रकार के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया है। लेकिन बड़ी चालाकी से इन लोगों को बचा भी लिया गया है। सबसे अहम बात है कि क्या इसकी निष्पक्ष जांच हो पाएगी और दोषियों को सजा होगी। एक ओर सरकार देश में भ्रष्टाचार के विरोध और ईमानदारी का ढिंढोरा पीट रही है, दूसरी ओर ये चतुर चालाक लोग तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर फर्जी कंपनियां बना कर अपना धन विदेशों में छिपा देते हैं। इससे भारी भरकम राजस्व की क्षति हो रही है। इस प्रकार के भ्रष्टाचार के दोषी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। इससे पहले भी पनामापेपर्स लीक प्रकरण में भी देखा गया कि जांच की लीपोपोती करके सरकार रह गई। अभी तक इस दिशा में कोई नतीजा सामने नहीं आया। ऐसे मे पैराडाइज पेपर्स में भी शायद ही कोई पकड़ा जाए। यह विश्व के विशाल लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। आम जनता को कम से कम यह अहसास होना चाहिए कि हमारे कर के पैसों को लूटा नहीं जा सकता। लेकिन सरकार हो या विपक्ष, इसमें सब फंसे हैं। कमाल यह है कि दोनों तरफ चुप्पी छाई हुई है।
’मिथिलेश कुमार, भागलपुर

संसाधनों की लूट
मनुष्य अपने जीविकोपार्जन के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करता आया है। आदिम-मानव पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था। उस समय जनसंख्या का घनत्व कम था, मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित थीं और प्रौद्योगिकी का स्तर नीचे था। उस समय संरक्षण की समस्या नहीं थी। कालांतर में मनुष्य ने संसाधनों के दोहन की प्रौद्योगिकी में विकास किया। वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास द्वारा मनुष्य संसाधनों का दोहन करने लगा। आज आधुनिक तकनीकी की सहायता से संसाधनों का दोहन और भी बड़े पैमाने पर होने लगा है। जनसंख्या की निरंतर वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों की लूट मची हुई है। मानव की उपभोग करने की मांग दिनोंदिन बढ़ी है। इस होड़ ने यह आशंका उत्पन्न कर दी है कि कहीं ये संसाधन शीघ्र समाप्त न हो जाएं और पूरी मानवता के जीवन पर ही प्रश्नचिह्न न लग जाए।
’सुशील कुमार वर्मा, गोरखपुर

बढ़ता तनाव
शहरीकरण के विष ने हमें हिला कर रख दिया। चाहे वह हमारे रिश्ते हों या हमारा वातावरण। चारों ओर शहरीकरण का विष दिखाई देता है। आज हर इंसान अपने आप में गुम है। अपने आसपास सब कुछ भूलता जा रहा है। ज्यादा कमाने के चक्कर में अपने बच्चों, परिवार और समाज से भी दूर होता जा रहा है। रिश्तों में भी व्यापार समा गया है। अपने-पराए की पहचान ही खत्म हो गई है। लिहाज और मुरौव्वत पराई चीज हो गई है। यही वजह है कि शहरी जीवन में तनाव बढ़ रहा है।

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