हैप्पी बर्थ डे झारखंडहैप्पी बर्थ डे झारखंड। अपना झारखंड 20 साल का हो गया। एक ऐसा युवा राज्य, जिसकी आंखों में तमाम रंगीन सपने हैं, क्षमता है और अपार सभावनाएं हैं। एक आम भारतीय परिवार में जब बच्चा 20 साल का हो जाता है, तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह भविष्य की अपनी राह तय कर चुका है और अब उसे उसी रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए परिवार और समाज के समर्थन की जरूरत है, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके। एक राज्य के रूप में झारखंड ने 20 साल के कालखंड में कई मुकाम हासिल किये हैं, लेकिन यहां के सवा तीन करोड़ लोगों में कहीं न कहीं ‘अबुआ राज’ के अधूरे सपने की पीड़ा अब भी तैरती नजर आती है। झारखंड के लिए ये 20 साल कैसे रहे, इसका मूल्यांकन तो इतिहास करेगा, लेकिन इतना जरूर है कि इसके जीवन का 20वां साल कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। कई ऐसे काम हुए, जो आज से पहले कभी नहीं हुए थे। इसलिए जैसे 20वीं सालगिरह महत्वपूर्ण है, वैसे ही भविष्य की इसकी यात्रा भी सुखद होगी। इसलिए अपने राज्य को हैप्पी बर्थ डे। झारखंड के अब तक के सफरनामे पर आजाद सिपाही टीम की खास प्रस्तुति।

हैप्पी बर्थ डे झारखंड। अपना प्रदेश अब बच्चा नहीं रहा, बल्कि 20 साल का गबरू जवान हो गया। यह वह उम्र है, जिसमें आंखों में रंगीन सपने होते हैं, दिल में बड़े अरमान होते हैं और बाजुओं में कुछ हासिल करने का हौसला होता है। इसलिए यह वक्त पीछे मुड़ कर देखने का नहीं, बल्कि मंजिल की ओर मजबूत कदम उठाने का है।
झारखंड को एक राज्य के रूप में स्थापित होने के 20 साल बाद भी कई ऐसी चुनौतियां हैं, जिनसे पार पाने की जरूरत है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि झारखंड ने इन सालों में प्रगति भी की है, लेकिन वह काफी नहीं है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर के अलावा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के स्तर पर अब भी बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है। आज से 20 साल पहले, जब झारखंड अलग राज्य के रूप में जन्म ले रहा था, अलग राज्य आंदोलन के सबसे बड़े योद्धा शिबू सोरेन ने कहा था कि झारखंड की यात्रा उस समय शुरू होगी, जब इस राज्य में पैदा हुआ बच्चा जवान होगा। वह वक्त आ चुका है और वाकई झारखंड अपने रास्ते पर लगातार आगे बढ़ने लगा है। लेकिन यह भी एक हकीकत है कि तमाम ऊंचाइयां हासिल करने के बावजूद कुछ ऐसी चुनौतियां झारखंड के सामने मुंह बाये खड़ी हैं।
पिछले साल के अंत में राज्य में पहली बार झामुमो के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार ने सत्ता संभाली। झामुमो ने अलग झारखंड राज्य के लिए जो लड़ाई लड़ी, जो कुर्बानी दी, उसकी गवाही तो इतिहास देगा ही, लेकिन उस समय झारखंड की सवा तीन करोड़ की आबादी की आंखों में उम्मीद की नयी किरण दिखाई पड़ी थी। यह किरण आज भी चमक रही है और हेमंत सोरेन की सरकार उसे पूरा करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है। पिछले 11 महीने में इस सरकार ने बहुत से काम किये हैं, लेकिन कुछ मोर्चों पर ध्यान दिये जाने की जरूरत है।
जहां तक चुनौतियों की बात है, तो झारखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती यहां की गरीबी से पार पाना है। राज्य की प्रति व्यक्ति आमदनी राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आमदनी से लगभग आधी है, जबकि राज्य की विकास दर बीते 20 साल में सात-आठ प्रतिशत रही है। इसका मतलब यह हुआ कि राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने के लिए झारखंड को अपने आर्थिक विकास की गति को तेज करना होगा।
भारत की औसत प्रति व्यक्ति आमदनी तक पहुंचने के लिए झारखंड को कम-से-कम 11 प्रतिशत की दर से विकास करना होगा, तभी वह भारत की औसत प्रति व्यक्ति आमदनी के बराबर पहुंचेगा। केवल विकास दर बढ़ाने से ही झारखंड का काम नहीं चल सकता। राज्य में व्याप्त असमानता को भी दूर करना होगा। झारखंड को मानव विकास सूचकांक के हर स्तर पर आगे बढ़ना होगा। चाहे वह बिजली हो, स्वच्छता हो, शिक्षा हो, भूख हो, गरीबी हो या बेरोजगारी हो। इन सभी स्तरों पर जब तक सम्यक रूप से नीति बनाकर काम नहीं किया जायेगा, तब तक मुश्किल है कि झारखंड अपने लक्ष्यों को प्राप्त करे। हालांकि, झारखंड जैसे संसाधन-संपन्न राज्य के लिए यह कोई मुश्किल नहीं है कि वह इन सूचकांकों को ठीक नहीं कर सकता। हेमंत सरकार ने पिछले 11 महीने में जिस इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, उससे तो यह बहुत मुश्किल नहीं लगता।
इसके साथ झारखंड को अपने कृषि क्षेत्र पर अधिक ध्यान देना होगा। यहां की करीब 50 प्रतिशत आबादी कृषि क्षेत्र से सक्रिय रूप से जुड़े हैं, लेकिन राज्य की जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान महज 14-15 प्रतिशत ही है, जबकि राज्य के केवल ढाई फीसदी लोग खनन क्षेत्र से जुड़े हैं और जीडीपी में उनका योगदान 12 प्रतिशत है। करीब साढ़े छह फीसदी रोजगार देनेवाला विनिर्माण क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी 14 प्रतिशत है।
ये आंकड़े बताते हैं कि झारखंड के विकास का पैटर्न बहुत विषम है और यह विषमता कई चुनौतियों को जन्म देती है। इसके बारे में सरकार को गहराई से सोचना पड़ेगा। झारखंड जैसे गरीब और प्रति व्यक्ति कम आमदनी वाले राज्य में छोटे और मंझोले उद्योगों का होना बहुत जरूरी है, ताकि वे लोगों की आर्थिक स्थितियों के हिसाब से वस्तुओं का निर्माण कर सकें। यह समझना होगा कि बड़ी औद्योगिक इकाइयों से ज्यादा रोजगार उत्पन्न नहीं होता। उनकी सीमाएं होती हैं और वे शहरों तक ही सीमित रहती हैं, जबकि छोटे और मंझोले उद्योगों से ज्यादा रोजगार उत्पन्न होता है। इसलिए विनिर्माण और खनन क्षेत्र में जीडीपी तो बहुत आता है, लेकिन बमुश्किल 10 प्रतिशत ही रोजगार उत्पन्न होता है। इसलिए झारखंड सरकार को चाहिए कि वह छोटे और मंझोले उद्योगों की ओर ध्यान दे, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा और ग्रामीण क्षेत्रों तक भी रोजगार की उपलब्धता बन सके।
झारखंड की आधी शहरी आबादी केवल चार शहरों में रहती है। ये हैं, रांची, जमशेदपुर, बोकारो और धनबाद। छोटे शहरों में कम लोग रहते हैं और उनका ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ाव बहुत कम है। यह स्थिति झारखंड के सर्वांगीण विकास में बाधक है। ग्रामीण क्षेत्र को शहरी क्षेत्र से जोड़ना बहुत जरूरी है, ताकि विकास बराबर हो सके। बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, खनन, कृषि, विनिर्माण आदि क्षेत्रों में छोटे उद्योग लगाना बहुत जरूरी है।
झारखंड के सामने एक बड़ी समस्या कर्ज का बोझ है। राज्य पर इस समय 85 हजार 234 करोड़ रुपये का कर्ज है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2000 से 2014 तक राज्य ने जितना कर्ज लिया, उससे अधिक कर्ज 2014 से 2019 के बीच लिया गया। जाहिर सी बात है कि हेमंत सोरेन के सामने राज्य पर इतने भारी कर्ज को उतारने की बड़ी चुनौती है। इतना ही नहीं, राज्य के किसानों पर भी छह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज चढ़ा हुआ है, जिसे उतारना भी बड़ा चैलेंज है। इसके अलावा झारखंड पर लगे गरीब राज्य के टैग को भी हटाने की चुनौती है। आंकड़े बताते हैं कि झारखंड की करीब 37 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करती है। झारखंड की प्रतिवर्ष खाद्यान्न आवश्यकता लगभग 50 लाख मीट्रिक टन की है, जबकि सबसे अनुकूल हालात में यहां खाद्यान्न उत्पादन 40 लाख मीट्रिक टन ही हो पाता है। ऐसे में इस 10 लाख मीट्रिक टन की खाई को पाट पाना बहुत बड़ी चुनौती है। गरीबी के अलावा बेरोजगारी भी झारखंड की बड़ी समस्या है। बताया जाता है कि झारखंड सर्वाधिक बेरोजगारी वाले राज्यों में शामिल है और सर्वाधिक बेरोजगारी दरों वाले प्रदेश में से एक है। सर्वाधिक बेरोजगारी वाले देश के 11 राज्यों में से झारखंड पांचवें स्थान पर है। यहां प्रत्येक पांच में से एक युवा बेरोजगार है। आंकड़ों के मुताबिक झारखंड के 46 प्रतिशत स्नातक और 49 प्रतिशत युवाओं को रोजगार नहीं मिलता।
इन चुनौतियों के बरअक्स हेमंत सोरेन सरकार ने पिछले 11 महीने में जो काम किये, उनका उल्लेख भी जरूरी है। सत्ता संभालने के तीन घंटे के भीतर पत्थलगड़ी अभियान में शामिल होने तथा सीएनटी/ एसपीटी एक्ट संशोधन का विरोध करने वालों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस लेने से शुरू हुआ हेमंत सोरेन सरकार का काम अलग सरना आदिवासी धर्म कोड का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कराने तक पहुंच चुका है। इस बीच में सात महीने तक कोरोना महामारी के कारण जारी लॉकडाउन के दौरान इस सरकार ने सामाजिक मोर्चे पर जितना काम किया, वह उल्लेखनीय है।
निस्संदेह ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ का नारा लंबे समय से आदिवासी समाज का सर्वप्रिय नारा रहा है। माना जाता है कि संथाल-हूल से इसकी उत्पत्ति हुई थी। लेकिन आज के समकालीन संदर्भों में यह किस प्रकार से साकार किया जा सकेगा, हेमंत सरकार के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण कार्यभार है। खासकर तब, जब हम सब चाहे अनचाहे एक ग्लोबल आर्थिक चेन में आबद्ध होकर चल रहें हैं, तो ऐसे में जन आकांक्षाएं लोकल हो ही सकती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें भी एक व्यापक फलक पर ले जाना जरूरी है। तभी हमारी संवैधानिक मान्यताओं के वास्तविक लोकतांत्रिक परंपरा की स्थापना हो सकेगी। साथ ही सबसे बढ़कर आज जिस संविधान को बचाने की जंग लड़ी जा रही है, उसकी भी मर्यादाओं की स्थापना हो सकेगी।
अंत में, आज झारखंड के लिए जश्न मनाने का दिन है और मनाया भी जाना चाहिए, लेकिन साथ ही भविष्य की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करने का भी वक्त है, क्योंकि झारखंड अब बच्चा नहीं रहा। अब उसके हर कदम को कसौटी पर कसा जायेगा और दुनिया उसे उलाहने भी देगी। झारखंड को इन सबको नजरअंदाज करना होगा। ऐसा करने में झारखंड सफल हो, यही शुभकामना।

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