अजय शर्मा
रांची (आजाद सिपाही) । मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासियों के हित में तैयार किये गये एक प्रस्ताव पर शुक्रवार को मुहर लगा दी। यह प्रस्ताव आदिवासी/सरना धर्मावलंबियों के लिए अलग सरना कोड का प्रावधान करने हेतु केंद्र सरकार को भेजे जाने से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि 2021 में होनेवाली जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग सरना कोड का प्रावधान किया जायेगा। गृह विभाग द्वारा तैयार किये गये इस प्रस्ताव को कैबिनेट की अगली बैठक में रखा जा सकता है। बता दें कि इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए 11 नवंबर को विधानसभा का विशेष सत्र भी आहूत किया गया है।
क्या है प्रस्ताव में
आदिवासियों को यदि सरना कोड मिल जायेगा, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। सरना धर्मावलंबी आदिवासियों की गिनती स्पष्ट रूप से जनगणना के माध्यम से हो सकेगी। आदिवासियों की जनसंख्या का स्पष्ट आकलन हो सकेगा।
आदिवासियों को मिलनेवाले संवैधानिक अधिकारों का लाभ प्राप्त हो सकेगा। इसमें केंद्रीय सहायता के लाभ तथा जमीन के पारंपरिक अधिकार भी शामिल हैं। आदिवासियों की भाषा, संस्कृति, इतिहास का संरक्षण तथा संवर्द्धन होगा। इस कारण ही सरना कोड आदिवासी समुदाय के विकास के लिए अति आवश्यक है।
क्यों जरूरी है अलग कोड
प्रस्ताव में कहा गया है कि 1871 से 1951 तक हुई जनगणना में आदिवासियों का अलग धर्म कोड था। 1961-62 की जनगणना में इसे हटा दिया गया। वर्ष 2011 की जनगणना में देश के 21 राज्यों में रहनेवाले 50 लाख आदिवासियों ने जनगणना प्रपत्र में सरना धर्म लिखा। झारखंड में सरना धर्म को माननेवाले लोग वर्षों से धर्म कोड लागू करने के लिए आंदोलन करते आ रहे हैं। वर्तमान और पूर्व के कई विधायकों ने भी आवेदन देकर इसे लागू कराने का अनुरोध किया है।
आदिवासियों की जनसंख्या में गिरावट
इस प्रस्ताव में कहा गया है कि आदिवासियों की जनसंख्या में भारी गिरावट आ रही है। इसकी वजह यह है कि जनगणना वैसे समय में होती है, जब आदिवासी दूसरे राज्यों में चले जाते हैं। वहां उन्हें सामान्य वर्ग में रखा जाता है। आदिवासियों की घटती जनसंख्या एक गंभीर सवाल है। वर्ष 2001 की जनसंख्या में आदिवासियों की जनसंख्या का प्रतिशत फिर कम हुआ है। जनसंख्या में लगातार कमी आखिर क्यों हो रही है।
देश में बढ़ती जनसंख्या चुनौती है, वहीं आदिवासियों की जनसंख्या घट रही है। 1931 से 2011 के बीच आदिवासी जनसंख्या के क्रमिक विश्लेषण से यह पता चलता है कि पिछले आठ दशकों में आदिवासी जनसंख्या का प्रतिशत 38.03 से घट कर 2011 में 26.02 प्रतिशत हो गया। इस दौरान 12 प्रतिशत की कमी हुई। झारखंड में कुल आबादी में वृद्धि दर अन्य समुदायों की वृद्धि दर से अत्यंत कम है।
आदिवासियों की जनसंख्या में इस गिरावट के कारण कई जिलों को पांचवीं अनुसूची के जिलों से बाहर करने की बात की जा रही है। इसका भी असर आदिवासियों पर पड़ेगा। इसलिए भी जनगणना में सरना धर्म कोड का होना जरूरी है।
आदिवासी/सरना कोड के प्रस्ताव पर हेमंत की मुहर
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