भारतीय राजनीति में चुनावी नारे हमेशा से दलों की चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण अंग होते रहे हैं। ‘गरीबी हटाओ’ से लेकर ‘अब आयेंगे अच्छे दिन’ और ‘जय जवान जय किसान’ से लेकर ‘झारखंड पुकारा भाजपा दोबारा’ तक के नारे तुकबंदी और पार्टियों के अंतिम लक्ष्य को अच्छी तरह परिभाषित करते हैं। कुछ राजनीतिक नारे तो इतने लोकप्रिय हो जाते हैं कि उन्हें बरसों बाद तक लोग याद रखते हैं। झारखंड विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव में भी राजनीतिक दलों के नारों ने बेहद अहम रोल अदा किया है। इन नारों का विश्लेषण करती आजाद सिपाही पॉलिटिकल ब्यूरो की रिपोर्ट।

आज से करीब तीन महीने पहले जब पूरा देश त्योहारों की खुमारी में डूबा था, झारखंड की सड़कों के किनारे बिजली के खंभों पर होर्डिंग लगाये गये थे, जिनके माध्यम से भाजपा ने अपना चुनावी एजेंडा स्पष्ट कर दिया था। लोकसभा चुनाव के फौरन बाद पार्टी ने विधानसभा चुनाव के लिए 65 प्लस का लक्ष्य तय किया था और इसलिए उन होर्डिंग पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘अबकी बार 65 पार’ का नारा लिखा गया था। भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता और कार्यकर्ता इसी नारे को दोहरा रहे थे। यहां तक कि जो केंद्रीय नेता झारखंड आते थे, वे भी इसी नारे को दोहराते थे।
चुनाव की घोषणा होने तक भाजपा का यह नारा पूरे झारखंड में फैल गया था और लोगों की जुबान पर भी चढ़ चुका था, लेकिन चुनाव प्रचार अभियान शुरू होने के बाद पार्टी ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत अपना नारा बदला और ‘अबकी बार 65 पार’ से बदल कर ‘झारखंड पुकारा भाजपा दोबारा’ पर आ गयी। इस बदलाव के राजनीतिक निहितार्थ चाहे जो भी रहे हों, लेकिन भाजपा का दूसरा नारा बेहद लोकप्रिय होता गया। पार्टी के केंद्रीय नेताओं ने चुनावी रैलियों में भी इस नारे का बखूबी इस्तेमाल किया।
उधर भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रहे झामुमो ने चुनावी नारा देने में थोड़ी देर की और चुनाव प्रचार अभियान के शुरुआती दौर में इसका कोई नारा नहीं था। चुनाव के दूसरे चरण में झामुमो ने ‘चलो चलें… अब बदलें सरकार’ का नारा दिया। इस नारे को अपेक्षित लोकप्रियता नहीं मिलता देख झामुमो ने इसे बदला और एक नया नारा गढ़ा गया। इसमें कहा गया ‘अबकी बार निश्चित हेमंत सरकार’। यानी पार्टी ने हेमंत सोरेन को नेता घोषित कर दिया और उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया। राजनीतिक हलकों में इस नारे के आने में देरी का मतलब यह निकाला गया कि झामुमो, कांग्रेस और राजद के गठबंधन में हेमंत को नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने के फैसले में हुई देरी हुई। इसलिए यह नारा देने में देरी हुई।
झामुमो की सहयोगी और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने झारखंड चुनाव में नारे का चुनाव बेहद सावधानी से किया। चूंकि वह राज्य की 81 में से केवल 31 सीट पर चुनाव लड़ रही है, इसलिए उसने किसी को नेता के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया। उसने नारा दिया ‘आ रही है कांग्रेस’। पार्टी ने इस नारे को इतना अधिक व्यापक रखा कि इसके आगे अलग-अलग मुद्दों की लाइनें जोड़ कर खूब प्रचारित-प्रसारित किया।
अब बात राज्य की सभी 81 विधानसभा सीटों पर अकेले दम चुनाव लड़नेवाले बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा की। पार्टी ने प्रचार अभियान के शुरुआती दौर में ही अपने अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को नेता घोषित कर दिया और उन पर केंद्रित नारा दिया ‘झारखंड बनेगा खुशहाल आ रहे हैं बाबूलाल’। बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे हैं और उनका करीब 16 महीने का कार्यकाल बेहद चर्चित रहा। पार्टी इसी को अपने चुनाव प्रचार अभियान के केंद्र में रख रही है और उसका पूरा फोकस बाबूलाल मरांडी के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है।
इन तमाम नारों में एक बात साफ है कि हर पार्टी अपने नारों में या तो किसी नेता का नाम या किसी पार्टी का नाम डाल चुकी है। नारों की इस भीड़ में एक नारा ऐसा है, जो बड़ी तेजी से लोकप्रिय भी हुआ है और असरदार भी होता दिख रहा है। यह नारा है ‘अबकी बार गांव की सरकार’। यह नारा भाजपा से अलग होकर राज्य की 53 सीटों पर चुनाव लड़नेवाली सुदेश महतो के नेतृत्व वाली आजसू पार्टी ने दिया है। आजसू पार्टी ने जब अपने घोषणा पत्र में यह नारा दिया, तो राजनीतिक हलकों में इसे बेहद सामान्य नारा बताया गया। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा, आजसू का यह नारा किसी सैलाब की तरह पूरे राज्य में फैलता गया और आज हर विधानसभा क्षेत्र में इस नारे की चर्चा हो रही है। इतना ही नहीं, पार्टी ने एक वीडियो फिल्म भी जारी की है, जिसमें झारखंड की तकदीर बदलने की बात कही गयी है।
आजसू पार्टी का नारा इसलिए भी चर्चित हो गया है, क्योंकि भारत के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी पार्टी ने अपने नारे में न तो किसी नेता का नाम लिया है और न ही पार्टी का, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद, यानी गांव की बात की है।
अब, चूंकि झारखंड विधानसभा चुनाव के चार चरणों के मतदान हो चुके हैं और अगले चार दिन में पांचवें चरण का मतदान भी हो जायेगा, राजनीतिक दलों के ये नारे भी धीरे-धीरे लोगों के बीच धुंधले पड़ते जायेंगे, ठीक वैसे ही, जैसे ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ जैसे नारे भुला दिये गये। लेकिन ‘अबकी बार गांव की सरकार’ का नारा यदि लंबे समय तक लोगों के जेहन में रहा, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किस पार्टी का नारा झारखंड की जनता को कितना लुभा सका, इसका पता तो 23 दिसंबर को चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद ही चलेगा, लेकिन इतना तय है कि चुनावी नारों की दौड़ में सुदेश कुमार महतो की पार्टी बाकी सब पर भारी पड़ी है और इस मामले में ‘एडवांटेज आजसू’ है।

Share.

Comments are closed.

Exit mobile version