आखिर क्यों आजसू से कुर्मी मतदाता लगातार दूरी बना रहे हैं
आखिर क्यों अपनी राजनीतिक जमीन खोती जा रही है पार्टी
25 सालों में कुल 18 विधायक ही बना पायी आजसू

राजनीतिक चूक
2014 में रामटहल चौधरी के खिलाफ सुदेश का चुनाव लड़ना बड़ी राजनीतिक चूक
गिरिडीह से सुदेश महतो के ससुर उमेशचंद्र मेहता को टाइगर जगरनाथ महतो के खिलाफ खड़ा करना बड़ी भूल
2019 और 2024 में निर्मल महतो के भाई की पत्नी सबिता महतो के खिलाफ प्रत्याशी देना बड़ी चूक

जीत-हार से आजसू को फर्क नहीं पड़ता ?
झारखंड में जेएमएम गठबंधन की सरकार गठन के बाद, मंत्रियों के विभागों का बंटवारा हो चुका है। सभी अपने-अपने कामों पर लग चुके हैं। वहीं भाजपा और आजसू के पास खुद को और एक-दूसरे को कोसने के अलावा, फिलहाल कोई कार्य नहीं बचा है। अब पांच साल तक फिर से इन्हें सत्ता से दूर रहना पड़ेगा। लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर भाजपा में देखने को मिल रहा है। भाजपा के लोग दुखी भी हैं। उनके चेहरों पर शिकस्त का असर साफ देखा जा सकता है। वहीं आजसू झारखंड की एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसे जीत-हार से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि इस पार्टी की मानसिकता जीत की है ही नहीं। यह झारखंड में एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसके नेताओं के कदम जमीन पर नहीं रहते, इसलिए ये जमीनी सच्चाई से दूर रहते हैं। यह इस बात से भी साबित होता है कि दस सीटों पर चुनाव लड़ने वाली आजसू मात्र एक सीट जीत पाती है, वह भी 231 वोट से। इस पार्टी के मुखिया 23 हजार 867 वोटों से बुरी तरह चुनाव हार जाते हैं। वहीं महज चुनाव पूर्व दो महीने पहले रजिस्टर्ड हुई पार्टी जेएलकेएम के प्रत्याशी देवेंद्र नाथ महतो को कुल 41 हजार 725 वोट आते हैं और वह आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो से मात्र 7577 वोट पीछे रहते हैं। समझा जा सकता है कि आजसू की जमीन किस तरह हिल रही है।

मानव शृंखला से लेकर राजनीतिक चूक की गठरी
दो अक्टूबर 2013 का दिन, झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर आजसू पार्टी और उसके करीब दो लाख कार्यकतार्ओं ने बरही से बहरागोड़ा तक मानव शृंखला बनायी थी। उस दिन बारिश के बावजूद आजसू और उसके कार्यकतार्ओं में उत्साह की कोई कमी नहीं थी। यह वही दौर था, जब आजसू पार्टी एक ताकत की तरह राज्य में पहचान बना चुकी थी। 2009 और 2014 के विधानसभा चुनावों में आजसू ने पांच-पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में सुदेश महतो बुरी तरह हार गये। सुदेश को इसका अंदाजा नहीं था कि ऐसा हुआ क्यों। लेकिन इसका बीज तो खुद सुदेश महतो ने बोया था। लोकसभा चुनाव के दौरान कुर्मियों के बड़े नेता राम टहल चौधरी के खिलाफ सुदेश महतो का रांची से चुनाव लड़ना एक बड़ी राजनीतिक चूक साबित हुई। इसका मैसेज कुर्मी समाज में अच्छा नहीं गया था। बस फिर क्या था, इसका बदला राम टहल चौधरी ने उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में ले लिया। सुदेश महतो चुनाव हार गये। समझा जा सकता है कि उस चुनाव में भाजपा को 37 सीटें मिली थी और आजसू को पांच। एनडीए की बहुमत की सरकार बनी। लेकिन सुदेश महतो की हार ने उनके राजनीतिक करियर पर ब्रेक लगा दिया। अगर वह जीतते, तो जरूर उनके पास कोई बड़ा मंत्रालय होता। अमित महतो के जेल जाने के बाद सिल्ली में उपचुनाव हुआ, सुदेश ने उपचुनाव भी लड़ा, लेकिन अमित महतो की पत्नी से वह चुनाव हार गये।

जब गांव वाले कहने लगे आजसू कुर्मी विरोधी है
यहां एक और बात ध्यान देने वाली है। सुदेश महतो के ससुर उमेशचंद्र मेहता ने आजसू के टिकट पर 2014 में गिरिडीह से लोकसभा चुनाव लड़ा था। इन्हें 55 हजार 531 वोट आये थे। वहीं टाइगर जगरनाथ महतो को तीन लाख 51 हजार 600 वोट आये थे और वह 40 हजार 313 वोटों से हार गये थे। कुरमी समाज में यह मैसेज गया कि टाइगर जगरनाथ महतो की हार आजसू प्रत्याशी उमेशचंद्र मेहता के कारण हुई है। इसका मैसेज भी आजसू के प्रति कुर्मी समाज में अच्छा नहीं गया। गांव वाले कहने लगे ये लोग कुर्मी विरोधी हैं। अब आजसू की कुर्मी मतदाताओं में पकड़ ढीली होनी शुरू हो चुकी थी। कुर्मी मतदाता उससे लगातार बिदकने लगे थे।

53 सीटों पर उतारा प्रत्याशी, गांव की सरकार बनाते-बनाते दो सीटों पर सिमट गयी पार्टी
फिर आया 2019 का विधानसभा चुनाव। एन वक्त पर आजसू ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया। आजसू ने 53 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिये। उस दौरान भाजपा 10 सीटें आजसू को गठबंधन में देना चाहती थी। लेकिन आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो 18 सीटों पर अड़ गये थे। अमित शाह ने तो यहां तक कहा था कि चार-पांच सीटों पर आजसू अगर फ्रेंडली फाइट में भी चुनाव लड़ जाती है, तो उन्हें आपत्ति नहीं है। आजसू की तरफ से हामी भी भरी गयी थी, लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि आजसू ने भाजपा से किनारा कर लिया और नारा दे डाला, अबकी बार गांव की सरकार। लेकिन गांव की सरकार बनाते-बनाते आजसू मात्र दो सीटों पर सिमट गयी।

2019 और 2024 में इचागढ़ से निर्मल महतो की भावज के खिलाफ प्रत्याशी देना एक और भूल
2019 और 2024 के विधानसभा चुनाव में झारखंड के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले दिवंगत निर्मल महतो के भाई सुधीर महतो की पत्नी ने जेएमएम के टिकट पर इचागढ़ से चुनाव लड़ा और जीता। आजसू ने भी उन चुनावों में वहां से प्रत्याशी दिया था। इसका असर भी कुर्मी मतदाताओं में साफ देखने को मिला। 2024 के विधानसभा चुनाव के दौरान वहां के कुर्मी वोटरों में एक मैसेज बड़ी तेजी से फैला कि आजसू कुर्मी विरोधी पार्टी है। इसका एक पम्फलेट भी बड़ी से लोगों के बीच फैला था कि एक तरफ तो आजसू पार्टी शहीद निर्मल महतो को पूजती है, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं की घर की महिला, जो उनके दिवंगत भाई सुधीर महतो की पत्नी हैं, के खिलाफ प्रत्याशी देती है। यह कैसी राजनीति है। सो कुर्मी मतदाताओं ने आजसू से साफ दूरी बना ली। यह बहुत बड़ा ब्लंडर आजसू के द्वारा हुआ।

आजसू में पार्टी नहीं लोग सर्वोपरि
वैसे आजसू को कुर्मियों की पार्टी कहा जाता था, लेकिन अब कुर्मी मतदाता आजसू से किनारा कर रहे हैं। उनकी पहली पसंद जयराम महतो हो गये हैं। कुर्मियों की आबादी झारखंड में 15 प्रतिशत है और जयराम महतो इनके नये पोस्टर ब्वॉय बन कर उभरे हैं। आजसू और जयराम की पार्टी जेएलकेएम में बस इतना ही अंतर है कि इस युवा राजनीतिज्ञ जयराम के पैर फिलहाल जमीन पर हैं। उसे अपनी चादर का पता है कि पैर कितना फैलाना है और कहां फैलाना है। लेकिन आजसू के साथ दिक्कत ही यही है कि उसे जमीनी हकीकत का अंदाजा ही नहीं रहता। यहां पार्टी नहीं, लोग सर्वोपरि हैं।

खींची हुई लकीर को लांघती रही पार्टी
वैसे आॅफर तो जयराम महतो के पास भी आया था, गठबंधन का। और भी कई प्रलोभन दिये गये थे, लेकिन जयराम महतो ने उन सभी को ठुकरा कर एकला चलो की राह को चुना। वह खुद को टटोल रहे थे। इस विधसानसभा चुनाव में अगर जयराम महतो गठबंधन कर लेते, तो उनकी सीटों की संख्या बढ़ जाती। और गठबंधन करने वाली पार्टी को भी फायदा हुआ होता। लेकिन जयराम महतो की यहां तारीफ करनी होगी कि वह डिगे नहीं। महत्वाकांक्षा होते हुए भी वह अपनी खींची हुई लकीर के विपरीत नहीं गये। यही अंतर है जयराम की पार्टी और आजसू में। आजसू पार्टी का कोई मानक नहीं है। इसलिए उससे समय-समय पर राजनीतिक चूक होती रही। भले जयराम की पार्टी ने कुल 71 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे मात्र एक सीट ही हासिल हो सकी, वह भी खुद जयराम महतो को। लेकिन विधानसभा चुनाव से मात्र दो दो महीने पहले रजिस्टर्ड हुई पार्टी ने भाजपा और आजसू की चूलें हिला दी। जयराम की पार्टी ने एनडीए को ऐसा धोया कि कइयों का भविष्य दांव पर लग चूका है। वैसे जयराम ने सबसे बड़ा डैमेज किसी को किया है, तो वह है आजसू। जयराम की पार्टी ने आजसू को 10 में से सात सीटों पर गहरी चोट पहुंचायी है। सिल्ली, रामगढ़, गोमिया, इचागढ़, मांडू, डुमरी और जुगसलाई। यह अलग बात है कि मांडू सीट जैसे-तैसे 231 वोट से आजसू ने जीत ली, लेकिन सांस तो वहां भी फूली ही हुई थी। आजसू ने हमेशा अपनी खींची हुई लकीर को लांघने का प्रयास किया है। आजसू की सच्चाई यह है कि 25 सालों में वह मात्र 18 विधायक ही बना पायी। साल 2000 में 1, 2005 में 2, 2009 में 5, 2012 के उपचुनाव में 1(हटिया), 2014 में 5, 2019 में 2, 2023 के उपचुनाव में 1 (रामगढ़) और 2024 के विधानसभा चुनाव में मात्र 1 सीट पर आजसू सिमट गयी।

आजसू से बाहर जाते ही जीत रहे प्रत्याशी
आजसू की आगे की राह भी कठिन दिखाई पड़ती है। आजसू को समझना होगा कि चूक कहां हो रही है। इस चुनाव में यह भी साबित हुआ जो प्रत्याशी आजसू में सालों से परफॉर्म नहीं कर पा रहे थे, दूसरे दल में जाते उन्होंने बेहतरीन रिजल्ट दिया। रोशन लाल चौधरी, जो लगातार तीन विधानसभा चुनाव से आजसू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे और हार का रिकॉर्ड बना रहे थे, भाजपा में जाते ही 31 हजार से अधिक वोटों से जीत जाते हैं। उमाकांत रजक को ही ले लीजिये, वह भी आजसू में हार का रिकॉर्ड बना रहे थे, लेकिन जैसे ही उन्होंने दल बदला और जेएमएम में शामिल हुए, 33 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज करते हैं। उन्होंने भाजपा के नेता प्रतिपक्ष अमर बाउरी को धूल चटा दी। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि आजसू से बाहर जाते ही जीत रहे हैं प्रत्याशी।

आजसू के बागियों ने भी खूब खेल किया
इस विधानसभा चुनाव में आजसू के बागियों ने भी खूब खेल किया है। जैसे हटिया, कांके, बहरागोड़ा, चतरा, भवनाथपुर, बेरमो, डुमरी, चंदनकियारी, तमाड़, मनोहरपुर, जामताड़ा, हुसैनाबाद, टुंडी में आजसू के बागियों ने भी एनडीए का खेल बिगाड़ा है। सबसे बड़ा उदहारण उमाकांत रजक का है, जिन्होंने जेएमएम का दामन थामते ही भाजपा विधायक दल के नेता का खेल बिगाड़ दिया। उमाकांत रजक चंदनकियारी से चुनाव जीत गये।

 

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