लखनऊ। कुछ लोग शौक और जुनून के कारण खेलों में आते हैं और कुछ लोगों के खून में ही खेल बसा होता है। उत्तर प्रदेश में पहली बार आयोजित किए जा रहे खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स (केआईयूजी-2022) में 55 किग्रा भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली पंजाब यूनिवर्सिटी की पहलवान इशिका दूसरी श्रेणी में आती है। पहलवानी इशिका के खून में रचा-बसा है क्योंकि उनके दादा और परदादा भी पहलवानी किया करते थे।
मूल रूप से हरियाणा के सोनीपत जिले की निवासी इशिका अभी दिल्ली में रहती हैं और हरियाणा के गोहाना के आलावा दिल्ली में पहलवानी की नर्सरी कहे जाने वाले छत्रसाल स्टेडियम में अभ्यास करती है। इशिका ने कहा,- यह मैरा पहला खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स था। वाराणसी में खेलकर अच्छा लगा। सुविधाएं बहुत अच्छी थीं। कम्पटीशन लेबल अच्छा था। आगे भी इन खेलों में हिस्सा लेती रहूंगी।
इशिका के पिता संदीप दिल्ली में अंडे का होलसेल काम करते हैं। मां गृहणी हैं और एक बड़ा भाई है, जो पढ़ाई कर रहा है। कुश्ती में कैसे आना हुआ,- 9 साल की थी तब सोनीपत में गीतांजलि स्कूल में पढ़ती थी। होस्टल में रहती थी। वहीं कुश्ती देखा और फिर इसमें रुचि जगी। मेरे पिता चाहते थे कि मैं कुश्ती करूं क्योंकि मेरे परिवार में पहले भी कई पहलवान रह चुके हैं।
इशिका पंजाब यूनिवर्सिटी में बीए सेकैंड इयर की छात्रा है। वह इससे पहले खेलो इंडिया स्कूल गेम्स में खेल चुकी हैं। इशिका ने बताया,- पुणे में आयोजित खेलो इंडिया स्कूल गेम्स में मैं खेली थी। 46 किग्रा वेट कैटेगरी में मेरा वहां कांस्य पदक था। इसके अलावा कैडेट नेशनल्स में खेल चुकी हूं जो पटना में हुआ था। इसमें सिर्फ हिस्सा लिया था। पटना में ही 2022 में जूनियर नेशनल चैंपियनशिप हुई थी, जिसमें 53 किग्रा में सिल्वर मेडल था। मैं गोहाना में परवीन और सोमबीर की देखरेख में प्रैक्टिस करती हूं। मैं तीन दिन गोहाना और तीन दिन दिल्ली में प्रैक्टिस करती हूं।-
दिल्ली के लिए नेशनल्स खेलने वाली इशिका का सपना देश के लिए ओलंपिक खेलना है लेकिन वह पूरी तैयारी के साथ उसके लिए अपना किस्मत आजमाना चाहती हैं। इशिका ने कहा,- देश के लिए ओलंपिक खेलना मेरा सपना है। पहले इसके लिए क्वालीफाई करने का लक्ष्य है। इसके लिए मैं खूब मेहनत कर रही हूं। चार घंटे सुबह और चार घंटे शाम को प्रैक्टिस करती हूं।
इशिका के पिता संदीप कुमार भी अपनी बेटी के साथ खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स के लिए वाराणसी गए थे। वह वहां के इंतजाम से काफी खुश नजर आए। संदीप ने कहा कि वह चाहते थे कि उनके घर में कोई पहलवानी करे। बेटे को इसमें रुचि नहीं थी, लिहाज उन्होंने बेटी को ही इस खेल में उतार दिया।
संदीप ने कहा,- कुश्ती मुझे पसंद है। मेरा शौक था कि मेरा कोई बच्चा कुश्ती में आए। मेरे दादा जी और पिता जी दोनों पहलवान थे। वे दंगल लड़ा करते थे। मैं किसी कारण से पहलवान नहीं बन सका और इसी कारण मैंने अपनी बेटी को इसमें डाला। मैंने इशिता को पांचवीं क्लास से ही पहलवानी में छोड़ दिया था। भिवानी में पढ़ती थी तब मैट पर चली जाती थी। इसका खुद इस खेल में इंटरेस्ट जगा और फिर जब नौवीं में गई तो सोनीपत के गीतांजलि स्कूल में 2018 में आयोजित नेशनल में गोल्ड मेडल जीता था।
खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स के बारे में संदीप ने कहा,- वाराणसी में जो इंतजाम हुआ था, उससे बच्चे बहुत खुश थे। लड़कियों के लिए बिल्कुल अलग व्यवस्था थी। होटल में भी सिर्फ लड़कियां ही रह रही थीं। काफी सुरक्षित माहौल था और खाना-पीना भी अच्छा था। मैंने देखा कि बाकी बच्चे भी काफी खुश थे और सब अपना बेस्ट देने का प्रयास कर रहे थे। खेलो इंडिया देश के भावी खिलाड़ियों के भविष्य के लिए बहुत अच्छा है।