कोल्हान का रण-पार्ट 3
लोकप्रियता कम नहीं है, लेकिन पांच सालों में जनता के बीच उनकी उपस्थिति कम रही
झामुमो-कांग्रेस की रणनीति को भेदना बड़ा चैलेंज है कोड़ा दंपति के लिए

चाइबासा की राजनीतिक जमीन और वहां की राजनीतिक संभावनाओं को टटोलने के बाद, आजाद सिपाही की टीम पहुंच गयी जगन्नाथपुर। जगन्नाथपुर जाने के क्रम में कई गांवों में हम रुके। लोगों का मन टटोला। यहां हो जाति के आदिवासी ज्यादा हैं। हो जाति की आदिवासी महिलाओं का पहनावा संथाली महिलाओं से अलग है। इन गावों के भ्रमण के दौरान एक घर की तस्वीर ने मुझे बहुत प्रभावित किया। छोटा खुला मिट्टी का घर। संसाधन भी नगण्य, खाने-पीने का भी अभाव दिखाई पड़ा। वहां तीन छोटे-छोटे बच्चे दिखे। एक बच्ची के हाथों में किताब थी वह पढ़ाई कर रही थी। दो बच्चों के तन पर कपड़े नहीं थे। सिर्फ पैंट पहन रखी थी उन्होंने। किसी ने सच ही कहा है कि जिसे विद्या चाहिए, वह कहीं से भी हासिल कर लेता है। बड़ा ही भावुक दृश्य। हमारी टीम जगन्नाथपुर के करीब पहुंच रही थी। सिरिंग्सिया घाटी के खत्म होते ही एक बाजार दिखा। वहां कई प्रकार के मशरूम ग्रामीण बेच रहे थे। वैराइटीज इतनी कि शहरों में कभी देखी नहीं। करीब 10 प्रकार के मशरूम थे वहां। इसे ग्रामीण छत्तू बोल रहे थे। उसका पूरा वीडियो आप आजाद सिपाही के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं। बड़े ही ईमानदार लोग थे। वाजिब दाम और ताजा मशरूम्स। ये मतदाता भी थे। कुछ तीर धनुष वाले थे तो कुछ भाजपा के। इनमें कुछ महतो भी थे। वे भाजपा के वोटर्स थे। जैसे ही हम जगन्नाथपुर पहुंचे, वहां का नजारा ही कुछ और था। शहर पोस्टरों से पटा पड़ा था। लग रहा था कि कोई पोस्टर वॉर छिड़ा हो। कहीं भाजपा की परिवर्तन यात्रा के पोस्टर्स तो कहीं मंईयां सम्मान योजना के पोस्टर्स ,तो कहीं कांग्रेस जेएमएम के झंडे तो कहीं भाजपा के झंडे। शहर में कदम रखते ही पता चल गया कि यहां चुनावी गर्मी ज्यादा है। यहां मधु कोड़ा, गीता कोड़ा के नामों की चर्चा तो हो ही रही थी, सोनाराम सिंकू भी छाये हुए थे। इसलिए नहीं कि वह वहां के विधायक हैं, बल्कि इसलिए कि बनाया तो उन्हें मधु कोड़ा ने ही है। यहां कोड़ा दंपत्ति का मुकाबला उनके खुद की साख से है। उनके द्वारा बनायी गयी खुद की ताकत से है। लोकसभा अगर गीता कोड़ा हारीं, तो उसके पीछे भी कई कहानी है। क्या है जगन्नाथपुर की राजनीतिक तस्वीर और स्थिति बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

जगन्नाथपुर का चौराहा। राजनीतिक दलों के पोस्टर्स और झंडों से भरा हुआ। गाड़ी से उतरा तो यहां काफी संख्या में कांग्रेस और जेएमएम के कार्यकर्ता दिखे। पता चला कि कल्पना सोरेन आ रही हैं। चार बजे सभा होनी है। उसमें करीब चार घंटे का वक्त था। लेकिन जेएमएम कार्यकर्ता चार घंटा पहले से उनके आने की तैयारी में लगे हुए थे। इससे यह आभास हुआ कि जेएमएम कार्यकर्ताओं में कल्पना सोरेन को लेकर कितना उत्साह है। मैंने सोचा कि पहले क्षेत्र घुमा जाये। जनता से बातचीत के क्रम में पता चला कि चौक पर जो दुकानें थीं, उनमें 90 प्रतिशत दुकानें किसी खास वर्ग से थीं। वे खास दल के समर्थक भी थे। वहां पर हमने कुछ-कुछ का मन टटोला। लेकिन सच्चाई से अलग एक-दूसरे के प्रति घृणा का भाव ही ज्यादा दिखा। हम उससे कुछ आगे बढ़े। वह इलाका मुसलिम मतदाता बहुल था। जितने भी मुस्लिम मतदाताओं से मैंने बात की, सभी ने गीता कोड़ा द्वारा क्षेत्र में किये गये कामों की सराहना की। उनका कहना था कि उन्होंने बेहतरीन काम किया है। भले हम लोग मुसलमान हैं और वह भाजपा में चली गयी हैं, लेकिन उनके द्वारा किये गये कामों को नकारा नहीं जा सकता। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने बहुत काम किया है। हां उनकी शिकायत यह जरूर थी कि पार्टी बदल कर उन्होंने अच्छा नहीं किया। उनका कहना था कि गीता कोड़ा को भाजपा में नहीं जान चाहिए था। मैंने पूछा अगर काम किया है, तो पार्टी बदलने से क्या फर्क पड़ना चाहिए। उनका कहना था कि नहीं फर्क तो पड़ता ही है। उन्होंने कहा कि आपने देखा नहीं, जब गीता कोड़ा कांग्रेस में थीं और महागठबंधन की उम्मीदवार थीं तो कैसे उन्होंने लोकसभा चुनाव में तहलका मचा दिया, लेकिन वही जब भाजपा में गयीं तो कैसे लोकसभा चुनाव में उनकी हार हो गयी।

उसके बाद हमने प्रसंग बदल दिया। फिर दूसरे लोगों से बात छिड़ गयी कि क्या कांग्रेस विधायक सोनाराम सिंकू को टिकट मिलेगा या फिर यहां जेएमएम उम्मीदवार देगा। उस पर इंडी एलायंस के वोटर्स का कहना था कि सोनाराम सिंकू ने बेहतरीन काम किया है। क्षेत्र में मोटर साइकिल से भी घूम-घूम कर लोगों की मदद करते रहते हैं। सोनाराम सिंकू के बारे में लोगों का कहना है कि वह न दिन देखते हैं न रात, वह अपने क्षेत्र की जनता के लिए हमेशा खड़े रहते हैं।

लेकिन इस सीट पर एक अलग ही दावा चल रहा है। जेएमएम समर्थक कहते हैं कि यह सीट जेएमएम को मिलनी चाहिए और मंगल सिंह बोबोंगा को मिलनी चाहिए। क्योंकि मधु कोड़ा को टक्कर यही देते थे। वहीं कांग्रेस वाले सोनाराम सिंकू का पक्ष रखते हैं। लेकिन कई मुस्लिम मतदाता मिले, जिन्होंने कांग्रेस से ज्यादा जेएमएम को तरजीह दी। इससे यह पता चला कि जेएमएम का संगठन कितना मजबूत हो गया है कोल्हान में। वैसे सोनाराम सिंकू के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने विधायकी मधु कोड़ा की बदौलत जीती। लेकिन आज यही सोनाराम सिंकू कोड़ा दंपति के सामने चुनौती बन कर खड़े हैं। वहीं मधु कोड़ा के बारे में लोग कहते हैं कि जिस राजनीतिक पिच पर गीता कोड़ा बैटिंग कर रही हैं, वह मधु कोड़ा द्वारा ही बनायी गयी है। जितनी पकड़ इस क्षेत्र में मधु कोड़ा की है शायद ही किसी की हो। लेकिन लोकसभा चुनाव में गीता कोड़ा की हार ने मधु कोड़ा की राजनीतिक पकड़ पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। तह तक जाने में पता चला कि यहां खेल कुछ और ही चल रहा था। गीता कोड़ा की हार में बहुत बड़ा रोल एक व्यक्ति का था, जिसने मधु कोड़ा को कह दिया कि आपकी छवि से लोगों में नाराजगी है, आप ज्यादा मत घूमिये। मधु कोड़ा इस चाल को समझ नहीं पाये। वहीं दीपक बिरुआ जो चाइबासा से विधायक हैं और अब मंत्री, ने जोबा मांझी के लिए ऐसी रणनीति बना डाली कि कोड़ा दंपति इसे भेद नहीं सका। चुनाव का चेहरा जोबा मांझी जरूर थीं, लेकिन लड़ रहे थे दीपक बिरुआ ही। हर विधानसभा सीट पर हर एक पहलू पर काम किया गया था। यहां तक कि गांव के प्रमुख व्यक्तियों तक पहुंच बनायी गयी थी, जिनकी अहम भूमिका रहती है चुनाव में। बूथ पर तो मानो एक कम्पटीशन लग गया था कि कौन बेहतर काम करे। दीपक बिरुआ ने ऐसी सटीक रणनीति बनायी कि कोड़ा दंपति उसे भांप नहीं सके। इस रणनीति को मधु कोड़ा बिल्कुल भेद लेते, लेकिन लोगों का कहना है कि बीते पांच सालों से कोड़ा दंपति में अलग ही घमंड प्रवास करने लगा था। वे कार्यकर्ताओं और जनता से कट गये थे। उन्हें लगने लगा था कि काम की बदौलत जनता उन्हें वोट दे ही देगी। लेकिन जनता के बीच नजर नहीं आइयेगा, तो जनता भी पहचानने से इंकार कर देगी। जनता बहुत उम्मीद लेकर नेताओं के दरवाजे जाती है। अगर कुछ कर नहीं सकते तो कम से कम हौसला बढ़ाने के लिए मिल तो सकते ही हैं। लोकसभा चुनाव से पूर्व यह सब हुआ नहीं। उन्हें लगने लगा कि वह अब विधायक बनाने की हैसियत में आ चुके हैं। लेकिन जनता भी जनता है, तुरंत उन्हें जमीन दिखा दी।

हालांकि जनता आज भी गीता कोड़ा के पक्ष में है, लेकिन पार्टी बदलने से उनके कुछ वोटर्स नाराज हैं। लेकिन नाराजगी तो अपनी जगह है, रणनीति को भेदना इनके सामने बड़ा चैलेंज है। सिंहभूम लोकसभा सीट पर झामुमो की जोबा मांझी ने गीता कोड़ा को 1,68,402 वोटों से हराया। यह गीता कोड़ा जैसी शख्सियत के लिए बड़ी हार थी। लोगों का तो यहां तक कहना है कि गीता कोड़ा अगर आज भी निर्दलीय चुनाव लड़ जायें तो वह जीत जायें। लोकसभा चुनाव का परिणाम कोड़ा दंपति के लिए सबक था। इन्हें समझना होगा कि जेएमएम की क्या रणनीति रही। मधु कोड़ा को समझने के लिए यह बड़ी बात नहीं है कि किस रणनीति के तहत जेएमएम ने काम किया था। गांव में कुछ छुपता थोड़े है। सब बता देते हैं। हो जनजाति का बड़ा तबका गीता कोड़ा के साथ है। लेकिन उन्हें अपने मतदाता तक पहुंचने की जरूरत है। पुराने और नये कार्यकर्ताओं में समन्वय स्थापित करने की जरूरत है। मधु कोड़ा को पुरानी स्टाइल अपनानी पड़ेगी, जहां वह ग्रामीणों से एक-एक कर मिलते थे। जानकारी वहीं से छन कर मिलती है। कौन प्रभावित कर रहा है, कैसे प्रभावित कर रहा है, यह भेद तो वहीं से खुलेगा। फिर उसके हिसाब से रणनीति बनानी पड़ेगी।

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